रचानावली
Wednesday, July 10, 2024
Tuesday, July 14, 2015
ज्यों की त्यों धरि दीन्हीं चदरिया–(पंच महाव्रत) प्रवचन--3
अचौर्य—(प्रवचन—तीसरा)
3
सितंबर 1970,
षणमुखानंद
हाल, मुम्बई
मेरे
प्रिय आत्मन्,
हिंसा
का एक आयाम
परिग्रह है।
हिंसक हुए
बिना परिग्रही
होना असंभव
है। और जब
परिग्रह विक्षिप्त
हो जाता है, पागल हो
जाता है, तो
चोरी का जन्म
होता है। चोरी
परिग्रह की
विक्षिप्तता
है, पजेसिवनेस दैट हैज गॉन मैड।
स्वस्थ
परिग्रह हो तो
धीरे-धीरे
अपरिग्रह का
जन्म हो सकता
है। अस्वस्थ
परिग्रह हो तो
धीरे-धीरे
चोरी का जन्म
हो जाता है।
स्वस्थ परिग्रह
धीरे-धीरे दान
में
परिवर्तित
होता है, अस्वस्थ
परिग्रह
धीरे-धीरे
चोरी में
परिवर्तित
होता है।
अस्वस्थ
परिग्रह का
अर्थ है कि अब
दूसरे की चीज
भी अपनी दिखाई
पड़ने लगी, हालांकि
दूसरा अपना
नहीं दिखाई
पड़ता है। अस्वस्थ
परिग्रह का
अर्थ है, वह
जो इनसेन पजेसिवनेस
है, वह
दूसरे को तो
दूसरा मानती
है, लेकिन
दूसरे की चीज
को अपना मानने
की हिम्मत करने
लगती है। अगर
दूसरा भी अपना
हो जाये तब
दान पैदा होता
है। और जब
दूसरे की चीज
भर अपनी हो
जाये और दूसरा
दूसरा रह जाये
तो चोरी पैदा
होती है।
Monday, September 2, 2013
Monday, December 24, 2012
पोनी एक कुत्ते की आत्म कथा,
अध्याय—3
काल चक्र एक नियति--
काल चक्र का
चलना एक नियति
हैं, इसकी
गति मैं
समस्वरता हैं,एक लय वदिता
हैं, एक
माधुर्य हैं
पूर्णता है।
जो चारों तरफ
फैले जड़ चेतन
का भेद किए
बिना, सब
में एक धारा
प्रवाह बहती
रहती है।।
उसके साथ बहना
ही आनंद हैं, उत्सव
हैं, जीवन
की सरसता हैं।
उसका अवरोध दु:ख, पीड़ा और
संताप ही लाता
हैं। लेकिन हम
कहां उसे समझ
पाते हमे तो
खोए रहते है
अपने मद में
अंहकार में, पर की
लोलुपता में
और सच कहूं तो
इस मन ने मनुष्य
के साथ रहने
से कुछ नये
आयाम छुएँ है।
मन में कुछ
हलचल हुई है।
कुछ नई तरंगें
उठी हे। मुझे
पहली बार मन
का भास इस
मनुष्य के साथ
रहते हुए हुआ।
ऐसा नहीं है कि
मन नहीं होता
पशु-पक्षियों
में, होता
तो है परंतु वो निष्क्रिय
होता है। सोया
हुआ कुछ-कुछ
अलसाया सा जगा
हुआ। लेकिन मनुष्य में यही
मन क्रियाशील
या सक्रिय हो
जाता है।
लेकिन मनुष्य
में ये पूर्ण
सजग,
जागरूक भी हो
सकता है। इस
लिए उस की बेचैनी
ही उसे धकेलते
लिए चली जाती
है। मनुष्य
केवल मन पर
रूक गया है।
शायद अपने नाम
को सार्थक
करने के लिए
ही समझो ‘’मनुष्य‘’ जिस का
मान उच्च हो
गया है। इस एक
मन के कारण
उसके पास जो
बाकी इंद्रियाँ
या अतीन्द्रिय
शक्ति कुदरत
ने सभी
प्राणीयों को
दी थी वो तो
धीरे-धीरे मृत
प्राय सी होता
जा रहा है।
काल चक्र एक नियति--
काल चक्र का
चलना एक नियति
हैं, इसकी
गति मैं
समस्वरता हैं,एक लय वदिता
हैं, एक
माधुर्य हैं
पूर्णता है।
जो चारों तरफ
फैले जड़ चेतन
का भेद किए
बिना, सब
में एक धारा
प्रवाह बहती
रहती है।।
उसके साथ बहना
ही आनंद हैं, उत्सव
हैं, जीवन
की सरसता हैं।
उसका अवरोध दु:ख, पीड़ा और
संताप ही लाता
हैं। लेकिन हम
कहां उसे समझ
पाते हमे तो
खोए रहते है
अपने मद में
अंहकार में, पर की
लोलुपता में
और सच कहूं तो
इस मन ने मनुष्य
के साथ रहने
से कुछ नये
आयाम छुएँ है।
मन में कुछ
हलचल हुई है।
कुछ नई तरंगें
उठी हे। मुझे
पहली बार मन
का भास इस
मनुष्य के साथ
रहते हुए हुआ।
ऐसा नहीं है कि
मन नहीं होता
पशु-पक्षियों
में, होता
तो है परंतु वो निष्क्रिय
होता है। सोया
हुआ कुछ-कुछ
अलसाया सा जगा
हुआ। लेकिन मनुष्य में यही
मन क्रियाशील
या सक्रिय हो
जाता है।
लेकिन मनुष्य
में ये पूर्ण
सजग,
जागरूक भी हो
सकता है। इस
लिए उस की बेचैनी
ही उसे धकेलते
लिए चली जाती
है। मनुष्य
केवल मन पर
रूक गया है।
शायद अपने नाम
को सार्थक
करने के लिए
ही समझो ‘’मनुष्य‘’ जिस का
मान उच्च हो
गया है। इस एक
मन के कारण
उसके पास जो
बाकी इंद्रियाँ
या अतीन्द्रिय
शक्ति कुदरत
ने सभी
प्राणीयों को
दी थी वो तो
धीरे-धीरे मृत
प्राय सी होता
जा रहा है।
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पोनी एक कुत्ते की आत्म कथा
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Dasghara, New Delhi, Delhi 110012, India
पोनी एक कुत्ते की आत्म कथा
अध्याय—2
मनुष्य
का पहला स्पर्श
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पोनी एक कुत्ते की आत्म कथा
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Dasghara, New Delhi, Delhi 110012, India
पोनी—एक कुत्ते की आत्म कथा
अध्याय—1
(मां
से बिछुड़ना)
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पोनी एक कुत्ते की आत्म कथा
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Saturday, April 9, 2011
सेक्स और तंत्र—
(मेरी सेक्स के पार की यात्रा)
जीवन में जो भी हम आज पाते है, वो कल बीज रूप में हमारा ही बोया हुआ होता है। पर समय के अंतराल के कारण हम दोनों में तारतम्यता नहीं जोड़ पाते और कहते है। ये क्या हो गया। उसमें कुछ अच्छा हो या बुरा। ये भेज बीज में है। बात उन दिनों की जब मैंने आठवीं कक्षा के पेपर दिये थे। हमारे जमाने में पांचवी-आठवीं और ग्यारहवां के बोर्ड के पेपर होते थे। पेपरों के तनाव को कम करने के लिए में उन दिनों प्रेम चन्द और रविन्द्र नाथ को पढ़ रहा था। इसी बीच मेरे हाथ में महात्मा गांधी की आत्म कथा आ गई। पढ़ कर चमत्कृत हो गया।
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