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Saturday, April 9, 2011

सेक्‍स और तंत्र—

(मेरी सेक्‍स के पार की यात्रा)
      जीवन में जो भी हम आज पाते है, वो कल बीज रूप में हमारा ही बोया हुआ होता है। पर समय के अंतराल के कारण हम दोनों में तारतम्यता नहीं जोड़ पाते और कहते है। ये क्‍या हो गया। उसमें कुछ अच्छा हो या बुरा। ये भेज बीज में है। बात उन दिनों की जब मैंने आठवीं कक्षा के पेपर दिये थे। हमारे जमाने में पांचवी-आठवीं और ग्यारहवां के बोर्ड के पेपर होते थे। पेपरों के तनाव को कम करने के लिए में उन दिनों प्रेम चन्‍द और रविन्‍द्र नाथ को पढ़ रहा था। इसी बीच मेरे हाथ में महात्‍मा गांधी की आत्‍म कथा आ गई। पढ़ कर चमत्‍कृत हो गया।