Saturday, October 17, 2009

स्‍वणिम बचपन-- ( 7)

    
          गुड़िया को मालूम है कि मैं नींद में बोलता हूं, लेकिन उसे यह नहीं मालूम कि मैं किससे बोलता हूं। सिर्फ मैं जानता हूं यह। बेचारी गुड़िया, मैं उससे बातें करता हुं और वह सोचती है और चिंता करती है कि क्‍यों बोल रहा हूं और किससे बोल रहा हूं। लेकिन उसे पता नहीं कि मैं इसी तरह उससे बातें करता हूं। नींद एक प्राकृतिक बेहोशी है। जीवन इतना कटु है कि हर आदमी को रात में कम से कम कुछ घंटे नींद की गोद में आराम करना पड़ता है। और उसको आश्‍चर्य होता है कि मैं सोता भी हूं या नहीं। उसके आश्‍चर्य को मैं समझ सकता हूं। पिछले पच्‍चीस सालों से भी अधिक समय से मैं सोया नहीं हूं।
          देव राज, चिंता मत करो। साधारण नींद तो मैं सारी दुनिया में किसी भी व्‍यक्ति से अधिक सोता हूं—तीन घंटे दिन में और सात, आठ या नौ घंटे रात में—अधिक से अधिक जितना कोई भी सो सकता है। कुल मिला कर पूरे दिन में मैं बारह घंटे सोता हूं। लेकिन भीतर मैं जागा रहता हूं। मैं अपने को सोते हुए देखता हूं। और कभी-कभी रात के समय इतना अकेलापन होता है कि मैं गुड़िया से बात करने लगता हूं। लेकिन उसकी बहुत मुश्किलें है। पहली तो यह कि जब मैं नींद में बोलता हूं तो हिंदी में बोलता हूं। नींद में मैं अंग्रेजी में नहीं बोल सकता, मैं कभी नहीं बोलुगां, हालांकि अगर मैं चाहूं तो बोल सकता हूं, एक आध बार मैंने कोशिश भी की है और मैं सफल भी रहा हूं। लेकिन मजा किरकिरा हो जाता है।
           तुम्‍हें मालूम होगा मैं उर्दू की प्रसिद्ध गायिका नूरजहाँ का एक गीत रोज सुनता हूं। रोज यहां आने से पहले मैं उसको बार-बार सुनता हू। इतनी बार सून कर तो कोई पागल हो जाएगा। मैं रोज गुड़िया पर उसी गीत की ड्रि‍लिंग करता हूं। उसे सुनना  ही पड़ता है, उससे बचने का कोई उपाय नहीं है। जब मेरा काम पूरा हो जाता है। तो मैं फिर उस गीत को सुनता हूं। मैं अपनी भाषा को प्रेम करता हूं,...इस लिए नहीं की वो मेरी भाषा है, लेकिन वह इतनी सुंदर है कि अगर वह मेरी न भी होती तो भी मैं उसे सिखा होता।
          जो गीत वह रोज सुनती है और जो उसे बार-बार सुनना पड़ेगा, उसमें कहा है: ‘तुम्‍हें याद हो के न याद हो, वह जो हममें तुममें करार था। कभी तुम कहा करते थे‍ कि तुम दुनिया में सबसे खूबसूरत स्‍त्री हो। अब मुझे नहीं मालूम कि तुम मुझे पहचान पाओगें या नहीं। शायद तुम्‍हें याद नहीं, लेकिन मुझे अभी भी याद है। मैं न उस करार को भूल सकती हूं, न तुम्‍हारे शब्‍दों को जो तुमने मुझसे कहे थे। तुम कहा करते थे कि तुम्‍हारा प्रेम पावन है। क्‍या तुम्‍हें अभी भी याद है। शायद नहीं, लेकिन मुझे याद है—निश्चित ही पूरी तरह से नहीं, समय ने कुछ-कुछ भुला दिया है।’
          ‘मैं तो जीर्ण शीर्ण महल हूं, लेकिन अगर तुम देखो, अगर तुम ध्‍यान से देखो तो पाओगें कि मैं वैसी ही हूं। मुझे अभी भी तुम्‍हारा करार और तुम्‍हारे शब्‍द याद है। वह करार जो कभी हमारे बीच था, क्‍या वह तुम्‍हे अभी भी याद है के नहीं? मैं तुम्‍हारे बारे में नहीं जानती, लेकिन मुझे अभी भी याद है।
          मेरी नींद में जब मैं गुड़िया से बातें करता हूं तो फिर हिंदी में बोलता हूं, क्योंकि मुझे मालूम है कि उसका अचेतन अभी भी अंग्रेजी नहीं है। वह इंग्‍लैड में सिर्फ कुछ वर्षो तक ही थी। उसके पहले वह भारत में थी और अब वह फिर भारत में है। इन दोनों कालों के बीच जो घटा, वह सब मैं पोंछ डालने की कोशिश करता  रहा हूं। इसके बारे में बाद में, जब समय आएगा....’
          आज मैं जैन धर्म के बारे में कुछ कहने बाला था। मेरा पागलपन तो देखो। हां, मैं बिना किसी सेतु के एक शिखर से दूसरे शिखर पर कूद सकता हूं। लेकिन तुम्‍हें एक पागल आदमी को थोड़ा सहन करना पड़ेगा। तुम प्रेम में पड़े हो, यह तुम्‍हारी जिम्‍मेवारी है, मैं इसके लिए जिम्‍मेवार नहीं हूं।
          संसार में सबसे कठिन तपश्‍चर्या बाला धर्म जैन  धर्म है, या दूसरें शब्‍दों में सर्वाधिक आत्‍मपीड़क और परपीडक धर्म जैन धर्म है। जैन मुनि स्‍वयं को इतना सताते है कि संदेह होने लगता है कि ये पागल तो नहीं है।
          मैं चार या पाँच साल का रहा होऊगां जब मैंने पहली बार एक दिगंबर जैन मुनि को देखा। वह मरी नानी के घर पा आमंत्रित था। मैं अपनी हंसी न रोक सका। मेरे नाना ने मुझे कहा: ‘चुप रहो, में जानता हूं कि तुम शरारती हो। जब तुम जब तुम पडोसियों को परेशान करते हो तो मैं तुम्‍हें माफ कर सकता हूं, लेकिन यदि तुमने मेरे गुरू के साथ कोई शैतानी की तो मैं तुम्‍हें क्षमा नहीं कर सकता। ये मेरे गुरु है। इन्‍होंने मुझे घर्म के आंतरिक रहस्‍यों में दीक्षा दी है।
          मैंने कहा: ‘आंतरिक रहस्‍यों से मेरा कोई संबंध नहीं हैं। मेरा तो दिलचस्‍पी बाहरी रहस्‍यों में है जो वह इतने साफ दिखा रहे है। ये नगन क्‍यों है। क्‍या ये कम से कम चडढी या ल्ंगोटी नहीं पहल सकते है?
          मेरे नाना भी हंस पड़े। उन्‍होंने कहा: ‘तुम समझते नहीं हो।’
          मैंने कहा: ‘ठीक है, मैं खुद ही उनसे पूछ लूंगा।’ फिर मैंने अपनी नानी से पूछा, ‘क्‍या मैं इस बिलकुल पागल आदमी से कुछ प्रश्‍न पूछ सकता हूं जो इस प्रकार पुरूष और स्त्रियों के सामने नग्‍न चले आते है?
          मेरी नानी ने हंस कर कहा: ‘जो पूछना हो पूछो, और तुम्‍हारे नाना क्‍या कहते है, इसकी फ़िकर मत करो। मैं तुम्‍हें इजाजत देती हूं। अगर ते कुछ कहें तो तुम इशारा कर देना। मैं उन्‍हें ठीक कर दूंगी।’
          नानी बहुत ही अच्‍छी थीं, बहुत साहसी थी; बिना किसी सीमा के पूर्ण स्‍वतंत्रता देने को तैयार थी। उनहोंने मुझसे यह भी नहीं पूछा कि मैं क्‍या पूछने जा रहा हूं। उन्होंने बस इतना ही कहा: ‘जो पूछना हो पूछो।’
          गांव के सब लोग जैन मुनि के दर्शन के लिए इकट्ठे हो गए थे। उनके तथाकथित उपदेश के बीच में मैं खड़ा हो गया। यह करीब चाल साल पहले की बात है। और तब से आज तक मैं निरंतर इन मूढ़ों से लड़ाई  लड़ रहा हूँ। जिसका अंत मेरी मृत्‍यु के साथ ही होगा। शायद तब भी समाप्‍त न हो, मेरे लोग शायद उसे जारी रखें।
          मैंने सरल से प्रश्‍न पूछे, लेकिन वह उत्‍तर न दे सका। मुझे बडी हैरानी हुई और मेरे नाना को बहुत शर्म आई। मेरी नानी ने मेरी पीठ थपथपाई और कहा, ‘शाबाश तुमने कर दिखाया। मुझे पता था कि तुम कर सकोगे।’
          क्‍या पूछा था मैने?  सिर्फ सीधा-सरल प्रश्‍न पूछे थे। मैंने पूछा था, ‘आप दुबारा जन्‍म क्‍यों नहीं लेना चाहते, जैन धर्म में यह सरल सा प्रश्‍न है, क्‍योंकि जैन धर्म की कुल कोशिश है कि दुबारा जन्‍म न लेना पड़े। यह दुबारा जन्‍म को रोकने का पुरा विज्ञान है। तो मैने उससे बुनियादी प्रश्‍न पूछा। क्‍या आप दुबारा जन्‍म नहीं लेना चाहते?
          उसने कहा: ‘नहीं, कभी नहीं।’
          तो फिर मैंने पूछा: ‘आप आत्‍महत्‍या क्‍यों नहीं कर लेते, आप अभी भी श्‍वास क्‍यों लिए जा रहे है। क्‍यों खाना, क्‍यों पानी पीना? खत्‍म करो, आत्‍महत्‍या कर लो। छोटी सी बात के लिए क्‍यों इतना उपद्रव करना।‘
          वह चालीस साल से ज्यादा उम्र का न था। मैंने उससे कहा: ‘अगर आप इस प्रकार चलते रहे तो शायद आपको और चालीस साल तक या उससे भी अधिक जीना पड़ेगा।’
          यह एक वैज्ञानिक तथ्‍य है कि जो लोग कम खाते है वे लंबा जीते है। देवराज निश्चित ही मुझसे सहमत होगा, यह तो बार-बार प्रमाणित किया जा चूका है कि अगर आप किसी भी प्राणी को उसकी आवश्‍यकता से अधिक भोजन दें तो वे मोटे और सुंदर और सुडौल जरूर हो जाते है, लेकिन वे जल्‍दी मर जाते है। अगर आप उनकी आवश्‍यकता से आधा भोजन दें, ता यह आश्‍चर्य की बात है कि वे सुंदर तो नहीं दिखाई देते, लेकिन औसत आयु से करीब-करीब दुगुनी आयु तक जीवि‍त रहते है। आधा भोजन और दुगुनी आयु: दुगुना भोजन और आधी आयु।
          तो मैंने जैन मुनि से कहा: ‘ये सब तथ्‍य उस समय मुझे मालूम नहीं थे—अगर आप दुबारा पैदा नहीं होना चाहते तो आप जी‍वित क्‍यों है, क्‍या केवल मरने के लिए, तो फिर आत्‍महत्‍या क्‍यों नहीं कर लेते?
          मुझे नहीं लगता कि ऐसा प्रश्‍न उससे कभी किसी ने पूछा होगा शिष्‍टाचार की इस दुनिया में अभी कोई असली प्रश्न नहीं पूछता है। और आत्‍महत्‍या का प्रश्‍न सबसे असली प्रश्‍न है। ‘अगर आप दुबारा पैदा नहीं होना चाहते तो, तो आप आत्‍महत्‍या कर ले, मैं आपको रास्‍ता बता सकता हूं। यद्यपि दुनिया के रास्‍तों के बारे में मैं अधिक नहीं जानता, लेकिन जहां तक आत्‍म हत्‍या का सवाल है मैं आपको कुछ सु1झाव अवश्‍य दे सकता हूं, आप गांव की पहाड़ी से कूद सकते है या आप नदी में छलांग लगा सकते है।’
          मैंने जैन मुनि से कहा: ‘बरसात के दिनों में आप मेरे साथ नदी में कूद सकते हो। थोड़ी देर हमारा साथ रहेगा, फिर आप मर स‍कते है, और में दूसरे किनारे पहुंच जाऊँगा। मैं अच्‍छा तैर सकता हूं।’ वह बहुत चौड़ी नदी थी, विशेषकर बरसात के दिनों में तो मीलों चौडी, करीब-करीब समुद्र जैसी लगती था। जब उसमें खूब बाढ़ आती तब मैं उसमें कूद पड़ता—दूसरे किनारे पहुँचे के लिए या मरने के लिए, ज्‍यादा संभावना यही होती थी कि मैं दूसरे किनारे कभी नहीं पहुंचूंगा।
          उन्‍होंने मेरी और इतने गुस्‍से से देखा कि मुझे उनसे कहना पडा याद रखो, आपको दुबारा जन्‍म लेना ही पड़ेगा, क्‍योंकि आप में अभी क्रोध है। चिंताओं के संसार से मुक्‍त होने का यह तरीका नहीं है। आप इतने गुस्‍से से मुझे क्‍यों देख रहे है। मेरे प्रश्न का उत्‍तर शांति से दीजिए। सुखपूर्वक उत्‍तर दीजिए। अगर आप उत्‍तर नहीं दे सकते तो कह दीजिए कि मैं नहीं जानता। लेकिन इतना क्रोध मत कीजिए।
          उसने कह: ‘आत्‍महत्‍या पाप है, मैं आत्‍महत्‍या नहीं कर सकता। लेकिन मैं चाहता हूं कि मेरा दुबारा जन्‍म न हो। सभी वस्‍तुओं का धीरे-धीरे त्‍याग करके मैं उस स्थिति को प्राप्‍त कर लूँगा।’
          मैंने कहा: ‘कृपया मुझे आप बताइए कि आपके पास है क्‍या। क्‍योंकि जहां तक मैं देख सकता हूं, आप नग्न हैं और आपके पास कुछ भी नहीं है।’
          मेरे नाना ने मुझे रोकने की कोशिश की। मैंने अपनी नानी की और इशारा किया और उनसे कहा, ‘याद रखिए, मैंने नानी से इजाजत ले ली है। और अब मुझे कोई भी रोक नहीं सकता, आप भी नहीं। मैंने नानी से आपके बारे में बात कर ली थी, क्‍योंकि मुझे डर था कि आप मुझसे नाराज हो जाएंगे। नानी ने कहा था बस मेरी तरफ इशारा कर देना। चिंता मत करों जैसे ही मैं उनकी तरफ देखूंगी, वे चुप हो जाएंगे।’
          और आश्‍चर्य, ठीक ऐसा ही हुआ। नानी ने देखा भी नहीं और नाना चुप हो गए। बाद में मैं और मेरी नानी खूब हंसे। मैंने उनसे कहा: ‘उन्‍होंने आप की तरफ देखा तक नहीं।’
          असल में उन्‍होंने अपनी आंखे बंद कर ली, जैसे कि ध्‍यान कर रहे हो। मैंने उनसे कहा: ‘नाना, बहुत खूब, आप क्रोधित हैं, उबल रहे है, आग जल रही है आपके अन्‍दर, फिर भी आप आंखें बंद करके ऐसे बैठे है, जैसे ध्‍यान कर रहे है। क्‍योंकि आपके गुरु अत्‍तर नहीं दे पा रहे है, लेकिन मैं कहता हूं कि यह आदमी जो यहां उपदेश दे रहा है, मूर्ख है।’
          और मैं चार या पाँच साल से ज्‍यादा का न था। उसी समय से यही मेरी भाषा रही है। मैं मूढ़ को एकदम पहचान लेता हूं, वह कही भी हो, मेरी एक्‍सरे आंखों से कोई नहीं बच सकता है। मैं मानसिक-अपंगता को या किसी भी चीज को तुरंत देख लेता हूं।
          अभी उस दिन मैंने अपने एक संन्‍यासी को वह फाउंटेन पेन दिया जिससे मैंने उसका नया नाम लिखा था। सिर्फ यादगार के कि यही है वो पेन जिसका मैंने उसके नये जीवन की, संन्‍यास की शुरूआत में अपयोग किया था। लेकिन उसकी पत्‍नी भी वहां थी। मैंने उसकी पत्‍नी को भी संन्‍यास लेने के लिए आमंत्रित किया, वह राज़ी थी, और नही भी, डांवाडोल थी—वह हाँ कहना चाहती थी और फिर भी कह नहीं पा रही थी। फिर मैंने उसे फुसलाने की कोशिश की—मेरा मतलब है संन्‍यास के लिए। मैंने थोड़ी देर अपना खेल जारी रखा और वह हां कहने के बहुत करीब आ गई थी, अचानक मैं रूक गया। मैं भी तो उतना सीधा नहीं हूं जितना बाहर से दिखाई देता हूं। मेरा मतलब यह नहीं है कि मैं जटिल हूं, मेरा मतलब यह है कि मैं चीजें इतनी स्‍पष्‍ट देख सकता हूं कि कभी-कभी मुझे अपना सीधापन और उसका निमंत्रण  वापस लेना पड़ता है।
          वह डर रहा था। मैं इस संन्‍यासी और उसकी पत्‍नी के आर-पार देख सकता था। उन दोनों के बीच कोई सेतु न था। और कभी रहा भी नहीं था, वे बस एक अंग्रेज दंपति थे, तुम जानते हो.....परमात्‍मा ही जाने कि उन्‍होंने शादी क्‍यों की थी? और परमात्‍मा तो है नहीं, मैं बार-बार यह दोहराता हूं, क्‍योंकि मुझे हमेशा लगता है कि तुम शायद सोचो कि परमात्‍मा सच में ही जानता है।
          परमात्‍मा नहीं जानता हैं, क्‍योंकि वह है ही नहीं। परमात्‍मा तो ऐसा शब्‍द है जैसे ‘जीसस’ इसका कोई अर्थ नहीं है। यह केवल एक विस्‍मयबोधक शब्‍द है। जीसस को अपना नाम कैसे मिला, उसकी ऐसी ही तो कहानी है।
          जोसेफ और मेरी अपने बच्‍चे के साथ बेथलेहम से घर वापस जा रहे है। मैरी बच्‍चे के साथ गधे पर बैठी है। जोसेफ गधे की रस्‍सी हाथ में पकड़े आगे-आगे चल रहा है। अचानक उसका पैर एक पत्‍थर से टकराया, उसे जोर की ठोकर लगी। वह चीख पडा, ‘जीसस’ और तुम स्त्रियों के ढंग तो जानते ही हो,...मैरी ने कहा, ‘जोसेफ’ मैं सोच रही थी कि अपने बच्‍चे का नाम क्‍या रखें। और अभी-अभी तुमने सही नाम ले दिया—‘जीसस।’
          इस प्रकार बेचारे बच्‍चे को अपना नाम मिला। यह संयोग नहीं है कि जब तुम गलती से अपने हाथ पर हथौड़ा मार लेते हो तो चिल्‍ला पड़ते हो—जीसस, ऐसा मत सोचो कि तुम कोई जीसस को याद कर हरे हो। चोट लगने से जोसेफ की भांति चिल्‍ला पड़ते हो—जीसस।
          मैं यह कह रहा था कि जिसस—यहां तक कि जीसस भी नाम नहीं है, बल्कि सिर्फ एक विस्‍मयबोधक शब्‍द है जिसे जोसेफ ने ठोकर लगने पर कहा था। इसी प्रकार है परमात्‍मा। जब कोई कहता है, ‘हे भगवान’ तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह भगवान में विश्‍वास करता है। वह तो केवल यह कह रहा है कि यह शिकायत कर रहा है—अगर यहां आकाश में कोई सुनने के लिए बैठा है तो। जब वह कहता है भगवान तो यह ऐसे ही है जैसे सरकारी कागजातों पर लिखा होता है—जिस किसी से भी संबंधित हो। ‘हे भगवान।’ का इतना ही अर्थ है—‘जिस किसी से भी संबंधित हो।’ और अगर वहां कोई नहीं है तो ‘माफ करे, ये किसी से भी संबंधित नहीं है।’ और इसका प्रयोग करने से मैं अपने को रोक नहीं सका’
             
--ओशो

स्‍वणिम बचपन--( 7 )

सत्र—7        जैन मुनि से संवाद
    
            गुड़िया को मालूम है कि मैं नींद में बोलता हूं, लेकिन उसे यह नहीं मालूम कि मैं किससे बोलता हूं। सिर्फ मैं जानता हूं यह। बेचारी गुड़िया, मैं उससे बातें करता हुं और वह सोचती है और चिंता करती है कि क्‍यों बोल रहा हूं और किससे बोल रहा हूं। लेकिन उसे पता नहीं कि मैं इसी तरह उससे बातें करता हूं। नींद एक प्राकृतिक बेहोशी है। जीवन इतना कटु है कि हर आदमी को रात में कम से कम कुछ घंटे नींद की गोद में आराम करना पड़ता है। और उसको आश्‍चर्य होता है कि मैं सोता भी हूं या नहीं। उसके आश्‍चर्य को मैं समझ सकता हूं। पिछले पच्‍चीस सालों से भी अधिक समय से मैं सोया नहीं हूं।
            देव राज, चिंता मत करो। साधारण नींद तो मैं सारी दुनिया में किसी भी व्‍यक्ति से अधिक सोता हूं—तीन घंटे दिन में और सात, आठ या नौ घंटे रात में—अधिक से अधिक जितना कोई भी सो सकता है। कुल मिला कर पूरे दिन में मैं बारह घंटे सोता हूं। लेकिन भीतर मैं जागा रहता हूं। मैं अपने को सोते हुए देखता हूं। और कभी-कभी रात के समय इतना अकेलापन होता है कि मैं गुड़िया से बात करने लगता हूं। लेकिन उसकी बहुत मुश्किलें है। पहली तो यह कि जब मैं नींद में बोलता हूं तो हिंदी में बोलता हूं। नींद में मैं अंग्रेजी में नहीं बोल सकता, मैं कभी नहीं बोलुगां, हालांकि अगर मैं चाहूं तो बोल सकता हूं, एक आध बार मैंने कोशिश भी की है और मैं सफल भी रहा हूं। लेकिन मजा किरकिरा हो जाता है।
             तुम्‍हें मालूम होगा मैं उर्दू की प्रसिद्ध गायिका नूरजहाँ का एक गीत रोज सुनता हूं। रोज यहां आने से पहले मैं उसको बार-बार सुनता हू। इतनी बार सून कर तो कोई पागल हो जाएगा। मैं रोज गुड़िया पर उसी गीत की ड्रि‍लिंग करता हूं। उसे सुनना  ही पड़ता है, उससे बचने का कोई उपाय नहीं है। जब मेरा काम पूरा हो जाता है। तो मैं फिर उस गीत को सुनता हूं। मैं अपनी भाषा को प्रेम करता हूं,...इस लिए नहीं की वो मेरी भाषा है, लेकिन वह इतनी सुंदर है कि अगर वह मेरी न भी होती तो भी मैं उसे सिखा होता।
            जो गीत वह रोज सुनती है और जो उसे बार-बार सुनना पड़ेगा, उसमें कहा है: ‘तुम्‍हें याद हो के न याद हो, वह जो हममें तुममें करार था। कभी तुम कहा करते थे‍ कि तुम दुनिया में सबसे खूबसूरत स्‍त्री हो। अब मुझे नहीं मालूम कि तुम मुझे पहचान पाओगें या नहीं। शायद तुम्‍हें याद नहीं, लेकिन मुझे अभी भी याद है। मैं न उस करार को भूल सकती हूं, न तुम्‍हारे शब्‍दों को जो तुमने मुझसे कहे थे। तुम कहा करते थे कि तुम्‍हारा प्रेम पावन है। क्‍या तुम्‍हें अभी भी याद है। शायद नहीं, लेकिन मुझे याद है—निश्चित ही पूरी तरह से नहीं, समय ने कुछ-कुछ भुला दिया है।’
            ‘मैं तो जीर्ण शीर्ण महल हूं, लेकिन अगर तुम देखो, अगर तुम ध्‍यान से देखो तो पाओगें कि मैं वैसी ही हूं। मुझे अभी भी तुम्‍हारा करार और तुम्‍हारे शब्‍द याद है। वह करार जो कभी हमारे बीच था, क्‍या वह तुम्‍हे अभी भी याद है के नहीं? मैं तुम्‍हारे बारे में नहीं जानती, लेकिन मुझे अभी भी याद है।
            मेरी नींद में जब मैं गुड़िया से बातें करता हूं तो फिर हिंदी में बोलता हूं, क्योंकि मुझे मालूम है कि उसका अचेतन अभी भी अंग्रेजी नहीं है। वह इंग्‍लैड में सिर्फ कुछ वर्षो तक ही थी। उसके पहले वह भारत में थी और अब वह फिर भारत में है। इन दोनों कालों के बीच जो घटा, वह सब मैं पोंछ डालने की कोशिश करता  रहा हूं। इसके बारे में बाद में, जब समय आएगा....’
            आज मैं जैन धर्म के बारे में कुछ कहने बाला था। मेरा पागलपन तो देखो। हां, मैं बिना किसी सेतु के एक शिखर से दूसरे शिखर पर कूद सकता हूं। लेकिन तुम्‍हें एक पागल आदमी को थोड़ा सहन करना पड़ेगा। तुम प्रेम में पड़े हो, यह तुम्‍हारी जिम्‍मेवारी है, मैं इसके लिए जिम्‍मेवार नहीं हूं।
            संसार में सबसे कठिन तपश्‍चर्या बाला धर्म जैन  धर्म है, या दूसरें शब्‍दों में सर्वाधिक आत्‍मपीड़क और परपीडक धर्म जैन धर्म है। जैन मुनि स्‍वयं को इतना सताते है कि संदेह होने लगता है कि ये पागल तो नहीं है।
            मैं चार या पाँच साल का रहा होऊगां जब मैंने पहली बार एक दिगंबर जैन मुनि को देखा। वह मरी नानी के घर पा आमंत्रित था। मैं अपनी हंसी न रोक सका। मेरे नाना ने मुझे कहा: ‘चुप रहो, में जानता हूं कि तुम शरारती हो। जब तुम जब तुम पडोसियों को परेशान करते हो तो मैं तुम्‍हें माफ कर सकता हूं, लेकिन यदि तुमने मेरे गुरू के साथ कोई शैतानी की तो मैं तुम्‍हें क्षमा नहीं कर सकता। ये मेरे गुरु है। इन्‍होंने मुझे घर्म के आंतरिक रहस्‍यों में दीक्षा दी है।
            मैंने कहा: ‘आंतरिक रहस्‍यों से मेरा कोई संबंध नहीं हैं। मेरा तो दिलचस्‍पी बाहरी रहस्‍यों में है जो वह इतने साफ दिखा रहे है। ये नगन क्‍यों है। क्‍या ये कम से कम चडढी या ल्ंगोटी नहीं पहल सकते है?
            मेरे नाना भी हंस पड़े। उन्‍होंने कहा: ‘तुम समझते नहीं हो।’
            मैंने कहा: ‘ठीक है, मैं खुद ही उनसे पूछ लूंगा।’ फिर मैंने अपनी नानी से पूछा, ‘क्‍या मैं इस बिलकुल पागल आदमी से कुछ प्रश्‍न पूछ सकता हूं जो इस प्रकार पुरूष और स्त्रियों के सामने नग्‍न चले आते है?
          मेरी नानी ने हंस कर कहा: ‘जो पूछना हो पूछो, और तुम्‍हारे नाना क्‍या कहते है, इसकी फ़िकर मत करो। मैं तुम्‍हें इजाजत देती हूं। अगर ते कुछ कहें तो तुम इशारा कर देना। मैं उन्‍हें ठीक कर दूंगी।’
            नानी बहुत ही अच्‍छी थीं, बहुत साहसी थी; बिना किसी सीमा के पूर्ण स्‍वतंत्रता देने को तैयार थी। उनहोंने मुझसे यह भी नहीं पूछा कि मैं क्‍या पूछने जा रहा हूं। उन्होंने बस इतना ही कहा: ‘जो पूछना हो पूछो।’
            गांव के सब लोग जैन मुनि के दर्शन के लिए इकट्ठे हो गए थे। उनके तथाकथित उपदेश के बीच में मैं खड़ा हो गया। यह करीब चाल साल पहले की बात है। और तब से आज तक मैं निरंतर इन मूढ़ों से लड़ाई  लड़ रहा हूँ। जिसका अंत मेरी मृत्‍यु के साथ ही होगा। शायद तब भी समाप्‍त न हो, मेरे लोग शायद उसे जारी रखें।
            मैंने सरल से प्रश्‍न पूछे, लेकिन वह उत्‍तर न दे सका। मुझे बडी हैरानी हुई और मेरे नाना को बहुत शर्म आई। मेरी नानी ने मेरी पीठ थपथपाई और कहा, ‘शाबाश तुमने कर दिखाया। मुझे पता था कि तुम कर सकोगे।’
            क्‍या पूछा था मैने?  सिर्फ सीधा-सरल प्रश्‍न पूछे थे। मैंने पूछा था, ‘आप दुबारा जन्‍म क्‍यों नहीं लेना चाहते, जैन धर्म में यह सरल सा प्रश्‍न है, क्‍योंकि जैन धर्म की कुल कोशिश है कि दुबारा जन्‍म न लेना पड़े। यह दुबारा जन्‍म को रोकने का पुरा विज्ञान है। तो मैने उससे बुनियादी प्रश्‍न पूछा। क्‍या आप दुबारा जन्‍म नहीं लेना चाहते?
            उसने कहा: ‘नहीं, कभी नहीं।’
            तो फिर मैंने पूछा: ‘आप आत्‍महत्‍या क्‍यों नहीं कर लेते, आप अभी भी श्‍वास क्‍यों लिए जा रहे है। क्‍यों खाना, क्‍यों पानी पीना? खत्‍म करो, आत्‍महत्‍या कर लो। छोटी सी बात के लिए क्‍यों इतना उपद्रव करना।‘
            वह चालीस साल से ज्यादा उम्र का न था। मैंने उससे कहा: ‘अगर आप इस प्रकार चलते रहे तो शायद आपको और चालीस साल तक या उससे भी अधिक जीना पड़ेगा।’
            यह एक वैज्ञानिक तथ्‍य है कि जो लोग कम खाते है वे लंबा जीते है। देवराज निश्चित ही मुझसे सहमत होगा, यह तो बार-बार प्रमाणित किया जा चूका है कि अगर आप किसी भी प्राणी को उसकी आवश्‍यकता से अधिक भोजन दें तो वे मोटे और सुंदर और सुडौल जरूर हो जाते है, लेकिन वे जल्‍दी मर जाते है। अगर आप उनकी आवश्‍यकता से आधा भोजन दें, ता यह आश्‍चर्य की बात है कि वे सुंदर तो नहीं दिखाई देते, लेकिन औसत आयु से करीब-करीब दुगुनी आयु तक जीवि‍त रहते है। आधा भोजन और दुगुनी आयु: दुगुना भोजन और आधी आयु।
            तो मैंने जैन मुनि से कहा: ‘ये सब तथ्‍य उस समय मुझे मालूम नहीं थे—अगर आप दुबारा पैदा नहीं होना चाहते तो आप जी‍वित क्‍यों है, क्‍या केवल मरने के लिए, तो फिर आत्‍महत्‍या क्‍यों नहीं कर लेते?
            मुझे नहीं लगता कि ऐसा प्रश्‍न उससे कभी किसी ने पूछा होगा शिष्‍टाचार की इस दुनिया में अभी कोई असली प्रश्न नहीं पूछता है। और आत्‍महत्‍या का प्रश्‍न सबसे असली प्रश्‍न है। ‘अगर आप दुबारा पैदा नहीं होना चाहते तो, तो आप आत्‍महत्‍या कर ले, मैं आपको रास्‍ता बता सकता हूं। यद्यपि दुनिया के रास्‍तों के बारे में मैं अधिक नहीं जानता, लेकिन जहां तक आत्‍म हत्‍या का सवाल है मैं आपको कुछ सु1झाव अवश्‍य दे सकता हूं, आप गांव की पहाड़ी से कूद सकते है या आप नदी में छलांग लगा सकते है।’
            मैंने जैन मुनि से कहा: ‘बरसात के दिनों में आप मेरे साथ नदी में कूद सकते हो। थोड़ी देर हमारा साथ रहेगा, फिर आप मर स‍कते है, और में दूसरे किनारे पहुंच जाऊँगा। मैं अच्‍छा तैर सकता हूं।’ वह बहुत चौड़ी नदी थी, विशेषकर बरसात के दिनों में तो मीलों चौडी, करीब-करीब समुद्र जैसी लगती था। जब उसमें खूब बाढ़ आती तब मैं उसमें कूद पड़ता—दूसरे किनारे पहुँचे के लिए या मरने के लिए, ज्‍यादा संभावना यही होती थी कि मैं दूसरे किनारे कभी नहीं पहुंचूंगा।
            उन्‍होंने मेरी और इतने गुस्‍से से देखा कि मुझे उनसे कहना पडा याद रखो, आपको दुबारा जन्‍म लेना ही पड़ेगा, क्‍योंकि आप में अभी क्रोध है। चिंताओं के संसार से मुक्‍त होने का यह तरीका नहीं है। आप इतने गुस्‍से से मुझे क्‍यों देख रहे है। मेरे प्रश्न का उत्‍तर शांति से दीजिए। सुखपूर्वक उत्‍तर दीजिए। अगर आप उत्‍तर नहीं दे सकते तो कह दीजिए कि मैं नहीं जानता। लेकिन इतना क्रोध मत कीजिए।
            उसने कह: ‘आत्‍महत्‍या पाप है, मैं आत्‍महत्‍या नहीं कर सकता। लेकिन मैं चाहता हूं कि मेरा दुबारा जन्‍म न हो। सभी वस्‍तुओं का धीरे-धीरे त्‍याग करके मैं उस स्थिति को प्राप्‍त कर लूँगा।’
            मैंने कहा: ‘कृपया मुझे आप बताइए कि आपके पास है क्‍या। क्‍योंकि जहां तक मैं देख सकता हूं, आप नग्न हैं और आपके पास कुछ भी नहीं है।’
            मेरे नाना ने मुझे रोकने की कोशिश की। मैंने अपनी नानी की और इशारा किया और उनसे कहा, ‘याद रखिए, मैंने नानी से इजाजत ले ली है। और अब मुझे कोई भी रोक नहीं सकता, आप भी नहीं। मैंने नानी से आपके बारे में बात कर ली थी, क्‍योंकि मुझे डर था कि आप मुझसे नाराज हो जाएंगे। नानी ने कहा था बस मेरी तरफ इशारा कर देना। चिंता मत करों जैसे ही मैं उनकी तरफ देखूंगी, वे चुप हो जाएंगे।’
            और आश्‍चर्य, ठीक ऐसा ही हुआ। नानी ने देखा भी नहीं और नाना चुप हो गए। बाद में मैं और मेरी नानी खूब हंसे। मैंने उनसे कहा: ‘उन्‍होंने आप की तरफ देखा तक नहीं।’
            असल में उन्‍होंने अपनी आंखे बंद कर ली, जैसे कि ध्‍यान कर रहे हो। मैंने उनसे कहा: ‘नाना, बहुत खूब, आप क्रोधित हैं, उबल रहे है, आग जल रही है आपके अन्‍दर, फिर भी आप आंखें बंद करके ऐसे बैठे है, जैसे ध्‍यान कर रहे है। क्‍योंकि आपके गुरु अत्‍तर नहीं दे पा रहे है, लेकिन मैं कहता हूं कि यह आदमी जो यहां उपदेश दे रहा है, मूर्ख है।’
            और मैं चार या पाँच साल से ज्‍यादा का न था। उसी समय से यही मेरी भाषा रही है। मैं मूढ़ को एकदम पहचान लेता हूं, वह कही भी हो, मेरी एक्‍सरे आंखों से कोई नहीं बच सकता है। मैं मानसिक-अपंगता को या किसी भी चीज को तुरंत देख लेता हूं।
            अभी उस दिन मैंने अपने एक संन्‍यासी को वह फाउंटेन पेन दिया जिससे मैंने उसका नया नाम लिखा था। सिर्फ यादगार के कि यही है वो पेन जिसका मैंने उसके नये जीवन की, संन्‍यास की शुरूआत में अपयोग किया था। लेकिन उसकी पत्‍नी भी वहां थी। मैंने उसकी पत्‍नी को भी संन्‍यास लेने के लिए आमंत्रित किया, वह राज़ी थी, और नही भी, डांवाडोल थी—वह हाँ कहना चाहती थी और फिर भी कह नहीं पा रही थी। फिर मैंने उसे फुसलाने की कोशिश की—मेरा मतलब है संन्‍यास के लिए। मैंने थोड़ी देर अपना खेल जारी रखा और वह हां कहने के बहुत करीब आ गई थी, अचानक मैं रूक गया। मैं भी तो उतना सीधा नहीं हूं जितना बाहर से दिखाई देता हूं। मेरा मतलब यह नहीं है कि मैं जटिल हूं, मेरा मतलब यह है कि मैं चीजें इतनी स्‍पष्‍ट देख सकता हूं कि कभी-कभी मुझे अपना सीधापन और उसका निमंत्रण  वापस लेना पड़ता है।
            वह डर रहा था। मैं इस संन्‍यासी और उसकी पत्‍नी के आर-पार देख सकता था। उन दोनों के बीच कोई सेतु न था। और कभी रहा भी नहीं था, वे बस एक अंग्रेज दंपति थे, तुम जानते हो.....परमात्‍मा ही जाने कि उन्‍होंने शादी क्‍यों की थी? और परमात्‍मा तो है नहीं, मैं बार-बार यह दोहराता हूं, क्‍योंकि मुझे हमेशा लगता है कि तुम शायद सोचो कि परमात्‍मा सच में ही जानता है।
            परमात्‍मा नहीं जानता हैं, क्‍योंकि वह है ही नहीं। परमात्‍मा तो ऐसा शब्‍द है जैसे ‘जीसस’ इसका कोई अर्थ नहीं है। यह केवल एक विस्‍मयबोधक शब्‍द है। जीसस को अपना नाम कैसे मिला, उसकी ऐसी ही तो कहानी है।
            जोसेफ और मेरी अपने बच्‍चे के साथ बेथलेहम से घर वापस जा रहे है। मैरी बच्‍चे के साथ गधे पर बैठी है। जोसेफ गधे की रस्‍सी हाथ में पकड़े आगे-आगे चल रहा है। अचानक उसका पैर एक पत्‍थर से टकराया, उसे जोर की ठोकर लगी। वह चीख पडा, ‘जीसस’ और तुम स्त्रियों के ढंग तो जानते ही हो,...मैरी ने कहा, ‘जोसेफ’ मैं सोच रही थी कि अपने बच्‍चे का नाम क्‍या रखें। और अभी-अभी तुमने सही नाम ले दिया—‘जीसस।’
            इस प्रकार बेचारे बच्‍चे को अपना नाम मिला। यह संयोग नहीं है कि जब तुम गलती से अपने हाथ पर हथौड़ा मार लेते हो तो चिल्‍ला पड़ते हो—जीसस, ऐसा मत सोचो कि तुम कोई जीसस को याद कर हरे हो। चोट लगने से जोसेफ की भांति चिल्‍ला पड़ते हो—जीसस।
            मैं यह कह रहा था कि जिसस—यहां तक कि जीसस भी नाम नहीं है, बल्कि सिर्फ एक विस्‍मयबोधक शब्‍द है जिसे जोसेफ ने ठोकर लगने पर कहा था। इसी प्रकार है परमात्‍मा। जब कोई कहता है, ‘हे भगवान’ तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह भगवान में विश्‍वास करता है। वह तो केवल यह कह रहा है कि यह शिकायत कर रहा है—अगर यहां आकाश में कोई सुनने के लिए बैठा है तो। जब वह कहता है भगवान तो यह ऐसे ही है जैसे सरकारी कागजातों पर लिखा होता है—जिस किसी से भी संबंधित हो। ‘हे भगवान।’ का इतना ही अर्थ है—‘जिस किसी से भी संबंधित हो।’ और अगर वहां कोई नहीं है तो ‘माफ करे, ये किसी से भी संबंधित नहीं है।’ और इसका प्रयोग करने से मैं अपने को रोक नहीं सका’।

Wednesday, October 14, 2009

फूल बाला

फूल वाला

फजलु मियां की पान की दुकान मोहल्‍ले की नाक थी। उसी के सामने एक बड़ा सा खुला चौक पसरा पड़ा था। जो भविष्‍य के सचिन, गावस्‍कर, कपि‍ल देव तैयार होने की नर्सरी का काम करता था। अब इस नर्सरी से चाहे सारा मोहल्‍ला परेशान क्‍यो न हो परन्‍तु मजाल क्‍या कोई उन्‍हे ड़ाटे-डप्‍टे या कुछ कहे, ये मेाहल्‍ले के ही नहीं, देश के साथ भी गदृरी समझी जाती। किस को पता है कल कोई निकल जाये सहवाग, गम्भीर, जो दूर दराज मोहल्‍ले का नाम रौशन करे, परन्‍तु ये तीसरी पीढ़ी चल रही है, नवाब पाटोदी से लेकर धोनी जी सम्हाल चुके है बाग डोर भारत की पर मजाल है आज तक ये साध पूरी हुई हो, पर एक आस है भविष्‍य के इन दुलारों से आज नवाब रजवाड़ों से क्रिकेट निकल कर गली मोहल्‍ले में तो आ गई है। सो भविष्‍य के इन जुगनुओ से उम्‍मीद है एक दिन मोहल्‍ले का नाम चमकायेगें। इस लिए वो कितना भी शोर मचाये, कैसा ही चौका-छक्‍का मारे, बीच में खुदा ना खोसता आप आ गये और बाल ने आपकी मुहँ पीठ या गाल तक की भी चुम्बन ले ली तो आपने केवल मुस्कराना है, किसी किस्‍म का कोई प्रतिरोध नहीं करना है। भले ही मोना लिसा जैसी मुस्‍कान न हो आप के हंसने की, इसके अलावा शाबाशी के लिए अगर आप ने ताली भी बजा दी तो ये हुई न सोने पे सुहागे वाली बात पुरी, ‘गुड़ शाँट .... बैल प्लेयड़ सर’। ये तो भला हो फटा-फट क्रिकेट का जो टेनिस के बाल से बच्‍चे खेलते है, वरना तो न किसी का सर हेाता न खिड़कियों पर कॉंच। फजलु मियां अपनी पान की दुकान  पर बैठे पान की गिलोरियां बनाते, बीच-बीच में विशेषज्ञ की भाति विशेष टीका-टीपणी भी देते नहीं थकते थे। फिर कौन सचिन कि तरह शाँट मारता है, या सोलकर की तरह कैच लपकता है, ये सब टीका-टिप्पणी मुतु स्‍वामी तक पहुँचा ही देते।  
मोहल्ले का थोड़ा परिचय क्‍या पूरा भारत दर्शन ही समझो, गली के दायें खन्‍ड़ेलवाल जी, उसके आगे खन्‍ना जी, नीम का पेड़ जिस घर के सामने है वो बाड़ कर जी का मकान, पान की दुकान के सामने भटृाचार्य जी, चोक के दूसरे कोन पर जहां दीवार पर क्रिकेट का विकट बना है, बहीं मोट-मोटे अक्षरों में लिखा है, एम सी सी (मुतु स्‍वामी क्रिकेट क्लब ) गाहे बगाहे वो ही बच्‍चो को क्रिकेट के महीन राज बताते है। बही एक पंडित थे क्रिकेट के हमारे मोहल्‍ले में। खंडेल वाल जी की परचून की दुकान थी , उससे कोई फरलांग भर आगे जहां गली खत्‍म हो चौड़ा रोड़ लाल किले कि तरफ जाता है। बही रामचंद्र हलवाई की मशहूर दुकान थी, जलेबी, समोसे, कचोरी सब लाजवाब। तीस साल से रामचंद्र जी दुकान चलाते है, दुकान कें आगे मजाल आप एक दोना, काग तक पा जाऔ, मुहँ में बीड़ी हाथ में झाडु सफाई का जुनून है उन्‍हें, यही वजह है, इस गली के अन्‍दर भी रामचंद्र की दुकान चल ही नही रही दौड रही है। मंगल के दिन तो सुबह से ही बुन्‍दी बनने लग जाती थी, उस दिन समोसे कचोरी वालो को तो आधे पेट ही रह जाना पड़ता था। उस दिन दुकान की रौनक देखने जैसी होती थी। चारों तरफ से ग्राहकों की मारा मारी , राम चन्‍द्र जी का काम केवल पैसे इक्कठा करके गल्‍ले में जगह बनाना होता था। सब बातों की एक बात हमारा मोहल्‍ला बहुजतियता, बहुसमाजिकता का आदर्श नमूना था। अगर कभी सरकार के मन में खेल रत्‍न, भारत रत्‍न के साथ मोहल्‍ला रत्‍न की घोषणा की तो आप ये समझीये ये इनाम तो गया हमारी झोली में। काश गांधी जी जिन्‍दा होते तो उनका सीना चौड़ा हो जाता फ़ूल कर, देख लेते आप अगर वो ‘साबरमती’ छोड़ हमारे मोहल्‍ले में रहने के लिए  नहीं आ जाते, हाय होनी को मन्‍जूर नहीं था ये सब, जब चने नहीं थे तब दांत थे, अब चने हुए तो दांत नहीं है।
 मोहल्‍ला क्‍या है गुणों की खान है, एक-एक के गुणों का जिक्र करू तो पुरा एक मेघ दूत सा ग्रंथ बन जायेगा, फिर वो धूल चाटता पड़ा रहता पुस्तकालयों में, सो भलाई इसी में है, इसे कहानी तक ही सीमित रखे। फजलु मियां का पूरा नाम फजलु रहमान कुरैशी था, इनकी बेगम के खानदान में कोई बेगम हजरत महल के हुजूर में पान की गिलोरियॉं लगाया करती थी। अब यहीं एक प्रसस्तिपत्र है फजलु मियां के पास वो भी केवल जबानी। फजलु मियां का पान आपने नौशा नहीं फर्माया तो नाहक आए आप दिल्‍ली। अरे अगर गली कूचे की बजाये कहीं होती फजलु मियां की दुकान कनाट प्‍लेस में तो देखना अमरीका तक फजलु मियां के पान निर्यात नहीं होते तो हमारा नाम बदल देते। मियां मुहँ में पान की गिलौरी रखी नहीं की लगी मक्‍खन की तरह पिघलने, अपने आप सुपारी मुहँ घुलने लग जाती, दाँतों को पता ही नही चलता कि कब पान चबाया, जनाब दूसरों के पान की सुपारी दांतों से तोड़ते-तोड़ते कब सुपारी दाँत को भी अपना हम सफर बना लेगी ये ड़र हमेश लगा रहता था, पान न खाना हो गया जनाब दांतों की कोई कसरत हो रही हो।
सामने मुतु स्वामी के यहां कोई नया किराये दार आया है, फूल बेचने बाला, मोहल्‍ला इसी एक सौगात के बिना अधूरा था। सो वो साध भी पुरी हुई, वरना तो दरीबे कला से जा कर फूल लाना न हो एक सजा मिल गई, चप्‍पलें चटकाते एक तो इतनी दुर जाऔ उपर से पुरा मोहल्‍ला ऐसे देखेगी की आप चिड़ियों घर के कोई प्राणी हो। कितने दिनो की ये साध पुरी हुई सब ने एक दूसरे को बधाईयाँ दी मुतु स्वामी की चप्‍पल बुद्धि के क़सीदे पढ़े गये। परन्‍तु फजलु मियां को वो आदमी फूटी आंख नहीं भाया, फजलु मियां की बात पर किसी ने गोर भी किया। बात आई गई हो गई दिन बीते महीने भर के अन्‍दर फूल वाले का परिवार भी आ गया। परिवार क्‍या भानमती का कुनबा समझो, आठ फूल से बच्‍चे, पूरी टीम में मात्र तीन कम मोना मुतु स्‍वामी ने कोई किराये दार न रख कर एक क्लब को निमन्‍त्रर्ण दिया हो। सारा दिन बच्‍चे गली मोहल्‍ले की घन्‍टीयॉं बजाते फिरते, किसी के आंगन में खेलने चले जाते तो रौनक मेला सा लग जाता, खाना खाने बैठते तो एक छोटा मोटा लंगर ही खुल जाता। चावल परोसते जब कोई आगे चलता तो पीछे-पीछे दाल, अचार, पापड़, लिए दूसरी बहन चल रही होती थी।
अचानक एक रात नो बजे मोहल्‍ले की शान्ति को श्राप लग गया, जोर-जोर से कोई गालियां बकने लगा, दरो दीवारों पर जो शान्ति इतने दिनो से पलास्टर की तरह चिपकी थी। आज अचानक भूर-भूरा कर गिर गई, घटना इतनी अनहोनी थी, मोहल्‍ले के लोगो ने खिड़कियॉ खोल के देखा कि‍ क्‍या हो रहा है। देखा तो फूल वाला दारू के नशे में अन्‍ट–शन्‍ट गालियां बक रहा था। फूल वाले की आमदनी बढ़ने लगी थी, आधा मैदान उसके फूलों की रेहड़ी की भेट चढ़ गया था। फिर अगर बच्‍चो की बाल आठ रतनों में से किसी को छू गई तो वो तांडव शुरू होता कि बच्‍चो को खेल खत्‍म कर घर जाना ही पड़ता। फिर रही सही कसर फूल बाला रात को आकर करता, सबकी मॉं बहन एक कर देता, ऐसी-ऐसी गलियों का उच्‍चारण किया जाता कि भोला नाथ की पर्यायवाची कोश भी फेल हो जाता, आप पूरा दिन सर खपाई करते रहो शब्‍द कोश में, मजाल वो शब्‍द आप को मिल जाये।
मोहल्‍ले की खुशी को ग्रहण लग गया, फजलु मियां ने तो पूत के पैर पहले ही देख लिये थे। परन्‍तु उसके अनुभव का मोहल्‍ले ने फायदा नही उठायॉं सो अब पछताने से क्‍या होता है, बात गई दो साल के लिए। दो साल का एग्रि‍मेन्‍ट किया था, मुतु स्‍वामी ने, फूल वाले के साथ। पहाड़ से ये दो साल क्‍या आज ही खत्‍म होने वाले है, सबको यही चिन्‍ता थी। क्रिकेट का ग्राउंड सुनसान पड़ा रहने लगा, बच्‍चे डरे सहमें किताबों में सर घुसाये उदास बैठे होते थे। दूध का गिलास रो झिक के पिलाया जाता, जो फ्रिज कल तक खाली मुहँ ताकता रहता था, आज फलों से भरा रहता, कोई उसे छूता भी नहीं। फजलु मियां का जब पान लगाते हुए सामने मैदान की तरफ ध्‍यान जाता वहां फूल वाले के बच्‍चे मस्‍त खेल रहे होते या एक दो चिड़ियाँ दाना चुग रही होती थी। फूल वाला तो सुबह ही पिन्‍नक में सवार हो जाता, फूलों पे पानी छिड़कते हुए दो चार बुन्‍दे शायद सोम रस की भी गिर जाती थी। राम चन्द्र हलवाई के सामने ही तो वो पुराना शिव मन्‍दि‍र था, जो शायद पांच सो साल पुराना अवश्‍य होगा। सालों पहले मन्दिर के एक कोने में पीपल के पेड़ के नीच हनुमान जी की मूर्ति स्‍थपित कि थी जब मन्‍दि‍र का नया नाम करकरना पड़ा था, ‘प्रचीन शिव हनुमान मन्‍दि‍र, अभी दो साल पहले लोगो के मन में श्लाधा उठी की सिर्डी के सॉंई बाबा की मूर्ति लाई जाये, सो पास ही रेलवे रोड़ कि दुकानों में से छांट कर सुन्‍दर मूर्ति ला स्‍थपित कर दी गई। अब नाम करण संस्कार भी पुण्य करना पड़ा सर्व सम्मति से नाम रखा गया,’ प्रचीन शिव हनुमान सॉंई मन्दिर’ अब आग की राम जाने या आने वाली नसलें ।
फुल वाला अपनी लड़की के साथ खड़ा हो फूल बेचता, नाजुक बेचारी सारदिन धूप में खड़ी रहती थी। फूल वाला सार दिन नशे में धुत्त रहता, लड़की जब घर चली जाती तो उसे न फूलों का होश रहता न सामने वाले का कोन खड़ा है। कभी तो किसी महिला के हाथ की उंगली को भी छू लेता था। अब तो फूलों के नीचे ही अपना पव्‍वा दब के रखता था, जब मन करता फूलों के नीचे से निकालता जय सोम रस। मुहँ से इतनी बू आती मन्‍दि‍र जाने से पहले मानो नरक के फाटक पर हाज़री देना अनिवार्य हो गया। कोई उसके मुहँ माथे नहीं लगता, कोन यहां घर बसाने आये है, फूल लिए और मन्‍दि‍र में।
राम चन्‍द्र हलवाई शोर मचाता ‘’ हमारे जमाने में चाय पीते भी ग्राहक अगर आ भी जाता तो पहले हाथ धोते फिर ग्राहक को  सामान देते थे। दुकान शिव जी का थड़ा है, इसे पवित्र पूजा भाव से करना चाहिए। परन्‍तु इस पापी फूल वाले ने तो सार कायदे कानून ताक पर रख दिए है।‘’
फूल बाला एक बार राम चन्‍द्र हलवाई की तरफ देखता, उसे लगता ये सब बक झक करते रहेगें पैसे जोड़ कर मर जायेंगे, बनेंगे मरने के बाद सांप उसकी रखवाली करने के लिए। क्‍या जीवन है इन लोगों का घास फूस खाते हैं, जानवरों की तरह और पानी पी कर राम नाम सत्‍य हो जायेंगे। वो इन फजुल की बातों पर ध्‍यान ही नही देता था। धीरे-धीरे मन्‍दि‍र के साथ मोहल्ले की साख भी मिटटी मिलने लगी। दूसरे मोहल्ले की बहु-बेटियाँ मन्दिर आने के लिए गली से न आ कर पूरा चक्कर लगा कर आना मन्जूर करती थी। मोहल्ले वालो ने पुलिस से सहायता ली, इतना काम जरूर कर दिया फूल वाला मन्दिर के सामने फूल नहीं लगता । कुआँ वापस अपने ठि‍काने सरक गया, जाना पड़ा फिर भी लोगो को फूल वाले के पास।
एक समस्‍या हो तो कहें, जो मैदान कभी शीशे की तरह साफ सुथरा रहता था। अब कूड़े के ढ़ेर लगे रहते, भंगन भी रोज झिक-झिक करके हार गई, तेल चुपड़े मटके पर पानी की एक बून्‍द रुके तब तो कोई बात फूल वाले के भेजे में घूसे। फूल वाले की बीवी का रंग एक दम शाह काल, परन्‍तु जब गली में बैठ पैरो की ऐडीयाँ रगड़ती तब लगता अब खून निकला की तब खून निकला, नहाने की राम जाने अन्‍दर ही कही हरी ओम हरी ओम कर लेती होगी। बच्‍चों के बाल चिड़ियों के घोसले हुए रहते, जब किसी का नहाने का नम्‍बर आता तो पूरे मोहल्ले में हाहाकार मंच जाता था।
मोहल्ले का गुण धर्म ही बदल गया, फजलु की दुकान पर मायूसी फैली रहती, क्रिकेट के बादशाह दूर से ही अपने प्रिय ग्राऊडं को निहार कर तृप्त हो जाते । फूल वाले का एक छत्र राज हो गया पूरे मोहल्ले पर। गांधी, बुद्ध, महावीर का अहिंसक मोहल्ला था। हिंसा तो यहां के शब्‍द कोश में भी नहीं थी। हां किसी फिल्‍म में ये दृश्य जरूर देखा होगा। अब कहां सें पैदा करे ‘’भैराम डाकू’’
को जो इस मोहल्ले को फूल वाले से मुक्ति दिलाये। अब भगवान भी मानो फूल वाले से प्रसन्‍न है, क्‍यों न हों इसके फूल जो भगवान जी के चरणों में चढ़ते है।
होली आई फूल वाले के नाते रिसते दार भी आ पधारे, क्‍या होली का हुड़दंग मचा रात के नौ बज गये, जो होली सालों से 2-3 बजे खत्‍म हो जाती थी मानो उसकी रील ही अटक गई खत्‍म हो फिर शुरू, ऐसी होली मोहल्ले ने देखी न सुनी थी। अरे ‘’बरसाने’’ बाले भी आ जाते तो यहां आके हार मान लेते। नाच गाना ढोल मंजीरा, गाली-गलौज मोहल्ले वालो ने खिड़कियाँ बंद कर टी वी की आवा तेज कर के इस शोर को अपने घर से दूर रखने की लाख कोशिश की। फिर भी कोई पंचम सुर इन अवरोधों को तोड़ कर अन्‍दर पहुँच ही जाता था। रात 12बजे जब ये नौटंकी खत्‍म हुई तब जा के मोहल्ले ने शान्ति की सांस ली। खन्‍ड़ेलवाल जी सुबह तीन बजे ऊठ दो घण्टे नित नियम से पूजा पाठ करते थे। घर के बीच खुला आंगन जिसमें एक भेल पत्र, अमरूद, नींबू, के साथ मौसमी फूल भी लगवाते थे, पूजा के लिए अपने घर के फूलों की क्‍या बिसात, एकदम शुद्ध न किसी की गन्‍दी छुअन न किसी की झूठ-कुठ, आज तो जमाना ही नहीं रहा, फूल क्‍या सब्‍जी क्‍या जब गाड़ियों में लाद कर लाते है तो जूतों समेत, वहीं पान तम्बाकू खा थूकते रहते है। लोग है कि संवेदन हीन हो गये है, हमारे जमाने में चारा काट कर जब खेत से लाते हुए आप गट्ठे पर बैठ गये तो मजाल क्‍या जो भैंस उसमें से एक ति‍नका भी मुँह में डाल ले। राम..राम समय ने कितनी जल्‍दी रंग बदल लिया, ये फूल वाला तोबा..तोबा, चारो तरफ गहन शान्ति का राज्‍य था, शायद कृष्‍ण पक्ष था, चांद कि अनुपस्थिति में तारा मँडल पूर्ण आभा छाई हुई थी। एक-आध बादल का टुकड़ा तारों के झुण्ड के साथ आँख मिचौली खेल रहा था। खन्‍ड़ेलवाल जी के पूजा के बर्तन साफ हो गये थे, लाल और सफेद चंदन घि‍सने कि तैयारी कर रहे थे। अचानक एक छोटी सी बदली जो अभी-अभी तारों के साथ आंख मिचौली खेल रही थी, मानो झुंझला के उसके आंसू निकल गये। बुन्‍दा-बान्‍दि‍ के साथ अचानक गली जो अभी तक शान्‍त थी, शोर से थरथराहा गई, खन्‍ड़ेलवाल जी ने खिड़की से झाँक कर देखा तो वहीं फूल बाला ऊपर की तरफ हाथ उठा कर गालियां दे रहा था। खन्‍ड़ेलवाल जी ने देखा क्‍या ये पागल हो गया है क्‍या, न आदमी न आदमी की जात फिर किसको ये गालियां दे रहा है। किस घड़ी में मुतु स्‍वामी इस निछत्र को मोहल्ले में लें आयजीना दूभर कर रखा है। पूजा की तैयारी कर ही रहे थे लो हो गई पूजा।
इतनी देर में एक काली सी परछाई दिखाई दी, उसकी आवज तो खन्‍डेलवाल जी के कानों में नहीं पड़ी परन्‍तु वो हाथ हिला कर कुछ इशारे कर रही थी। जिसका जवाब नशेडी फूल वाला इतने जोर से दे रहा था, वो खन्‍ड़ेलवाल के कानों को भी फाड़े डाल रहे थे।
‘’देखो ये हराम खोर मोहल्ले वाले मुझे रात को सोने भी नही देते, छत पर खड़े हो कर मेरे ऊपर पानी फेंक रहे है। मैरा जीना हराम कर रखा है, इस मोहल्ले में या नरक में आ गया हूँ, थू है इस मोहल्ले को’’...........।
इतनी देर में परछाई का हाथ घूमा च.टा..‍क...बड़ी जोर से एक आवाज आई, फूल बाला चारों खाने चित। परछाई ने हाथ हि‍ला का कुछ निर्देश दिये और अचानक अंधेरे में गायब। ये सब इतनी जल्‍दी हुआ की खन्‍ड़ेवाल जी को यकीन ही नहीं आता, अगर फूल वाले को नीचे गि‍रा नहीं देखता। पुजा का समय बीता जा रहा था। कितनी देर पूजा करते रहे आज पूजा में भी ध्‍यान नहीं लग रहा था, बार-बार फूल वाले की तरफ जाता था। कितनी देर से बाहर का भी कोई शोर नहीं आया, कैसी निभ्रर्म शान्ति फैली रही घण्टों तक मानो ये अपना वो मोहल्ला ही नही है, जहां कुछ देर पहले महातांड़व हो रहा था।
काली अंधेरी रात बीत गई, गली में भी मानो शुक्‍ल पक्ष का उजियारा फैलने लगा था। फिर मोहल्ला दोबारा अपनी चिर परिचित गति में लौटने लगा था। फूल वाले की चिडि़यॉं एक दम चुप जैसे उसकी जबान को लकवा मार गया हो। सुबह सवेरे मोहल्ले का चौक एक दम साफ सुथरा। किसी को भी यकीन नहीं आया रात तो इतनी मूसलाधार बारिश हो रही थी, अचानक ये सूरज भगवान कैसे निकल आया।
खन्‍ड़ेलवाल जी जब श्‍याम को पूजा के लिए पान सुपारी लेने गये तो फजलु मिया को रात की परछाई वाली बात का जि‍क्र किया ‘’ फजलु मिया मेरी बात का यकीन करो या मत करो परन्‍तु मैने सुबह-सुबह एक चमत्‍कार देखा’’
फजलु मिया ने गर्दन हिलाते हुये कहा ‘’क्‍या देखा लाला जी’’
‘’ये जो अपना फूल वाला है इसकी चिड़िया चुप भोले बाबा के गणों ने की है, एक काली सी परछाई इस पर कोई मन्‍त्र मार गई नहीं ये शैतान आदमी के बस में आने वाला नहीं था।
लोग कछ भी कहे भोले बाबा अपने भगतों की सुनता है, धन्‍य हुई मेरी आंखें जो भगवानसही उसके गण की एक झलक तो पाई।‘’
फजलु मिया ने पान सुपारी पत्‍ते मे लपेटते हुए, एक हलकी सी मुस्‍कान बिखेरी, और आसमान की तरफ देखते हुए कहां अल्ला सब पे करम फ़रमा। ‘’ शिव-शिव जय भोले’’
‘’भगवान के घर देर है अन्‍धेर नहीं, जय सिया राम’’
फूल बाला मोहल्ला छोड़ कर चला गया, एम0 सी0 सी0 क्लब फिर आबाद होने लगा। परन्‍तु किसी की बात समझ में नहीं आई ये अचानक फ़ूल वाले को हो क्‍या गया। जाते हुए भी फजलु मिया से हाथ जोड़ कर माफी भी मांग रहा था।  मुतु स्‍वामी को सबने हिदायत दे दी थी, अगर दोबारा कोई किराये दार रखे तो पुरी तरह छान बीन कर ले। फिर मुतु स्‍वामी ने वो कमरा कभी किराये पर नहीं दिया, भविष्‍य के सहवाग और धोनी...... के लिए खाली छोड़ दिया कि जब कोई खिलाड़ी भारत का प्रतिनिधित्‍व करेगा वो ही इसकी भरपाई करेगा। देखो कब साध पूरी होती है मोहल्ले कि या मुतु स्‍वामी की, फजलु मिया की पान कि गिलोरीयों के साथ अब भी रीले केमेस्ट्री या आँखो देखा हाल जारी है।
पान के साथ एक शरारती मुस्‍कुराहट भी परोसने लगे थे फजलु मिया जिसे कोई समझने की कोशिश भी नहीं करना चाहता था, सोचते है ये फजलु का कोई नया स्टाइल है।

कहानी

    तालाब


सुनने के लिए कान, दर्द के स्पंदन को महसूस करने के लिए दिल,  देखने के लिए आँखें चाहिए । प्रत्येक बुद्ध पुरुष बार-बार यही दोहराता है ’’ कान है तो सुन लो,  आँखें हैं तो देख लो ।’’ मैं सोचता था जब छोटा था,  क्या वे अंधे-बहरे लोगों के सामने बोल रहे थे। प्रकृति की एक लय है, एक समस्वरता है, उसमें पेड़, पौधे, जल, थल, चाँद, तारे, क्षितिज की भी लयबद्घता है,  फिर क्या मनुष्य ने प्रकृति से अपने को अलग-थलग कर लिया है,  जो उसके जीवन का अभिन्न अंग था। प्रकृति से विच्छिन्न हो आधुनिक उपकरणों को अपने जीवन में रचा-बसा लिया है। वही शायद उसके भाव और संवेदनशीलता को निगल रहा है। शायद समय ने इस प्रश्‍न को और अति प्रश्‍न बना दिया हैं। सुबह जल्दी उठने की आदत थी,  सुबह की ताज़ा हवा, नींद में अलसाई सी प्रकृति, वातावरण में कैसी निभ्रर्म शांति फैली थी, मन्द्र हवा में पत्ते का हिलना, आपको ऐसा प्रतीत होगा मानो पत्ता हवा को कह रहा हो अभी और सौ लेने दो। सुबह के वातावरण में पेड़-पौधों के साँस लेने की प्रक्रिया का बदलाव और सुगबुगाहट से लगता मानो,  माँ की छातियों से दूध पीते किसी बच्चे के मुँह में ज़्यादा दूध भर गया हो और वो लम्बी-लम्बी उसास भर सुबकी याँ ले रहा है।                                     आपको सुबह पेड़-पौधों को देख कर यही भान होगा।  किसी पेड़ की टहनी आपको जरा छू भर गई नहीं की आप कैसे अन्दर तक सिहर जायेंगे, जैसे वो आपको जान‍ती है और आपके छूने से ईठला रही है। भोर की जगती हुई प्रकृति आपके शारीर के रोए-रोए मैं कैसे जागरण का संचार भर देगी। पार्क के किनारे पर एक बहुत बड़ा बरगद का वृक्ष था । उसके चारों तरफ़ पक्का चबूतरा बनाया हुआ था। पार्क में मुलायम हरी घास,  बैठने के लिए बैंच, सुन्दर फूलों के पौधे, चारों तरफ़ अमल ताश,  सह मल, नीम और बोगीनबिल्ला की झांड़ियाँ, गाँव के इस दम घोटू विकास में हरियाली की एक मात्र यहीं जगह  खुले पन का अहसास दे रही थी।
                   मैं फेफड़ों से अशुद्ध हवा निकालते हुए पार्क के तीन-चार चक्कर लगाता था। शुद्ध हवा शारीर के रोम-रोम से प्रवेश कर उसे अघिक प्राण वान बना देती । पतंजलि‍ का आलोम-विलोम तो,  आज के तनाव पूर्ण जीवन की गति मैं, बैल गाड़ी जैसा हो गया है। बरगद के चबूतरे पर एक दरी बिछा कर,  झूर-पटा होने तक ध्यान करता था। गाँव के एक बुर्जग जिन्हें हम सब महाशय जीकह कर पुकारते थे, जब उन्होने मुझे ध्यान करते देखा तो प्रसन्नता के साथ-साथ एक नेक सलाह भी दे डाली। महाशय जी का जरा सा परिचय दे दूँ,  दयानंद जी के पक्के भगत थे,  ता उम्र शादी ना करने का व्रत,  जिसे वो आज तक निभा रहे हैं। अँग्रेज़ों के जमाने से ही दिल्ली पुलिस के नौकर थे,  अभी कुछ दिन पहले ही रिटायर्ड हुए हैं।
            ’’बेटा ध्यान मैं एक सफ़ेद पतली चादर ओढ़ कर बैठा करो,  तुम एक पेड़ के नीचे बैठ कर ध्यान करते हो ये बहुत अच्छा करते हो। मैं तो पहाड़ी पर एक खुली जगह पर बैठ कर ध्यान करता था। एक दिन चील के मन में क्या आई, पन्जों से सर पर हमला कर दिया,  सर में पन्जें गड़ गए और ख़ून बहने लगा , उस घटना के बाद से मैं भी एक पेड़ के नीचे बैठ कर ध्यान करने लगा हूँ।’’
            ये नेक सलाह मैने उनकी मान ली,  पतली सफ़ेद चादर ओढ़ कर जिस दिन मैं बैठा, मानो एक झीना सा मन्दिर का गुम्बद मेरे चारों तरफ़ निर्मित हो गया। ध्यान भी उस दिन बहुत गहरा गया,  अचेतन की गहराई में बोलने की फुसफुसाहट ने चारों तरफ़ से घेर लिया, एक छूती ध्वनि तरंग मुझे बहुत गहरे मैं सुनाई दी,  जहाँ पर विचार भी दम तोड़ते हुए पीछे छूट गए थे। उस दिन ध्यान के बाद शरीर मैं ऐसी मधुरता भर गई,  जैसे किसी नवयौवना के शरीर को पहली बार उसके प्रेमी के छूने से भर जाती हैं। एक मधुर थकान,  एक अलसाया पन और इसके बीच बहती आनन्द और चुलबुले पन की धारा। फिर ये क्रम कई दिन लगातार चला, जैसे बचपन मैं गर्म बिस्तरों पर अल साए,  नींद भरी आँखों को मसलते,  ऊँघते हुए पंच तंत्र की कहानी सुनते बच्चों को केवल ध्वनि तो सुनाई देती,  परन्तु मन उस ध्वनि को शब्दों मैं परिवर्तित नहीं कर पा रहा होता। गहरा अचेतन आज भी शब्द नहीं जानता,  आपके सपनों मैं भी कोई भाषा नहीं होती,  और न होते है रंग,  कोई बिरला ही रंग और शब्दों से लिप्त स्वप्न देख पाता है।
            तालाब-- ’’सुनते हो तुम्हारे संग और सौंदर्य को महसूस करने के लिए कोई तुम्हारी गोद मैं आकर बैठा था।’’
            बरगद--’’हाँ देखता हूँ, सालों बाद कोई इतने करीब आया हैं।’’
            तालाब--’’मैं जब से मिटटी,  रोड़े, पत्थरों के नीचे दब गया हूँ,  एक अन्त हीन घुटन,  छटपटाहट,  बेचैनी सी महसूस करता हूँ,  न जाने कोन सी आस जो सालों पहले मरे हुए को मरने भी नहीं देती।’’
         बरगद--’’ऐसा नहीं कहते तुम तो धरती की गोद में कितने आराम से सो रहे हो,  मुझे देखो,  न जमीन के नीचे पानी, और ऊपर से दम घोटू ये चबूतरा,  जड़ को दीमक ने खोखला कर दिया हैं। अब साँस भी कितनी मुश्किल से ले पाता हूँ,  पत्ते भी गाडियों के धुँऐ के कारण कैसे लकवा ग्रस्त से हो गए हैं। इन पर जमी धुँऐ की परत ने,  मुझे बारह महीने अन्धा बना दिया हे। २००वर्ष की आयु में ही कैसा बूढ़ा जर्जर सा लगता हूँ, दादा परदादा कहा करते थे, ६००वर्ष मैं तो कोई जा के युवा होता था। अब तो भगवान से केवल यहीं प्रार्थना करता हूँ, उठा ले इस नर्क से ।‘
            तालाब--’’  मेरे ऊपर फैली‍‍ नर्म मुलायम घास,  उस पर दौड़ते-भागते ये बच्चे,  बेंच पर बैठी बूढ़ों की महफिल,  औरतों का छोटे बच्चों की उँगली पकड़ उनको चलना सिखाना,  कुछ क्षणों के लिए क्या वही रौनक-मेला फिर नहीं लौट आता हैं,  ये सब अच्छा नहीं लगता।’’
            बरगद--’’अच्छा तो बहुत लगता है, परन्तु अब पहले जैसी बात कहाँ रही। मुश्किल से कोई बच्चा पतंग के बहाने ही मेरे नजदीक आता है, पत्थर मारता हैं,  पहले कैसे बंदरों की तरह लदे रहते थे, पक्षियों से भी ज़्यादा गूलर तोड़-तोड़ कर कैसे बिखेरते थे। बरसात में भी घर नहीं जाते, जब तुम किनारे तक लबालब भर जाते,  कैसे काँपते-ठिठुरते नीले होठ लिए, मेरी टहनियों पर चढ़ कर तुम्हारे गर्म-गर्म पानी में छ-पाक से कूद जाते तब तुम कैसा  छिटक कर बखर जाते थे। तब तुम्‍हें कैसा लगता था, पानी में रुनकझुनक बूँदों की बरसात,  और उपर से मेंढकों का गूलू रे फूलाफला कर टर्र..टर्र...की अविछिन्न बहती ताने, मानो बादलों को धन्यवाद दे, खुशी में मेध मल्हार गा रहे हो।’’
            ध्यान के बाद जब तुम धीरे से आँखें खोल कर देखोगे तो वही पुराने दृश्य अभूतपूर्व सौन्दर्य लिए हुए होगें, ध्यान का ताज़ा-ताज़ा होश आँखों को कोरी और निर्मल बना देता हैं। पक्षियों की चह-चाहाट,  आती-जाती गाडियों का शोर,  कौवों की काँव..काँव...धीरे-धीरे मेरे कानों को सुनाई देने लगी,  तब मुझे अपने होने का भान हुआ। फिर सारा दिन यही विचार मेरे मस्तिष्क में इधर से उधर लुढ़कते रहे,  हफ्तों बाद भी एक सूत्र में पिरो नहीं पाया था।                       
            दिल्ली के बढ़ते विस्तार ने इन गाँवों को कंकरीट का जंगल बना दिया हैं। ठुसी आबादी,  चिड़िया धर के दड़बों की तरह बने कमरे,  सड़क पर जहाँ देखो तहाँ नर मुंड ही नर मुंड,  बीच मैं रेंगाती गाड़ियाँ,  मस्त जुगाली करती गाय और उनके बछड़े,  शोर मचाते सब्ज़ी खोंमचों वालों के हाट,  बीच-बीच मैं घण्टे-घड़ियाल बजाते साई और प्रचीन शिव-हनुमान मन्दिर, कान के पीछे पो-पो, चों-चों करते साइकिल-स्कूटर वाले,  अरे भले मानस देखते नहीं कंधे से कंधे छीले जा रहे हैं,  तुम्हे अपने टी..ई..टी..ई की पड़ी। सब्र का घूँट तो कोई पीने को तैयार ही नहीं हैं, सब को जल्दी पड़ी हैं, जैसे इनको जरा भी देरी हुई नहीं तो लाखों काम बिगड़ जायेंगे। सब जानते हैं धर जाकर टी०वी० के सामने बड़ा सा मुँह खोल कर झमाईयाँ लोगे,  या बिना सर पेर के चंडूख़ाना चटपटे समाचार, या फूहड़ धारावाहिक जो गोलगोल कुएँ के मेंडक की तरह, जिनकी चाल के सामने चींटियों को भी शर्मा आ जाए।
            आज जहाँ पार्क बना है, ३०साल पहले तक यहाँ एक तालाब हुआ करता था,  उसे प्यार से ‘’रामतला’’ कह कर पुकारते थे। क्योंकि वह मनुष्य, पशु, पक्षियों के लिए,  उत्सव, मेले, दुख-र्दद, सभी के लिए वो जीवन का ए‍क अभिन्न अंग था। कैसे थे वो लोग जिन्हे आज हम अनपढ़ गंवार समझते हैं। जो एक तालाब का नामकरण भी ’’राम तलासरीखा रख देते थे, कैसे प्रेम छलक-छलक बहता होगा उनके ह्रदय से, हमारे सूखे, नीरस और बेजान ह्रदय समझने मैं भी असमर्थ हैं। डी०डी०ए० ने अधीनीकरण के नाम पर उसे मिटटी, पत्थरों से भर कर एक पार्क बना दिया । शादी,  जन्म दिन,  नेताओं के भाषण,  धर्मी उत्सव,  आधुनिक राम लीला की बड़ी स्टेज के लिए जगह की कमी खलती थी। पुराने उत्सव मैले, आज के आधुनिकता की दौड़ मैं गँवारूपन प्रतीत होते हैं। अब शायद ये गाँव के लिए बोझ बन गया था, सो तालाब को शहीद कर दिया गया और उसके उपर एक कब्र बना दी पार्क के नाम की।
            एक तो तालाब इतना बड़ा,  और उस पर फैले जल का ये अनन्त विस्तार, उसके स्‍वच्‍छ जल मैं झाँकती पेड़-पौधों की परछाई,  एक किनारे से उठी लहर दूर जब दूसरे किनारे की चट्टानों से जब टकरा कर छिटकती, तो कैसे आवाज़ करती, छ...प्पा....क ... और अगर आप पास खड़े है तो आप हो गए सराबोर। जहाँ पानी है,  वहाँ जीवन तो होगा ही। पीपल, बरगद, नीम, रोझ और किंकरों का तो पूरा जंगल ही था। वहाँ हमारा भी एक नीम का वृक्ष था, उसे डूँड़ा नीम कह कर पुकारते थे। आप सोचे होगे हमारा नीम, गाँव का प्रत्येक व्यक्ति राम तला के पास एक पेड़ लगा कर अपने को धन्य समझता था। ये डूँड़ा नीम हमारे परदादा ने लगाया था। मैने भी पिता जी से हठ करके एक सहमल का पेड़ लगवाया,  उसके चारों तरफ़ काँटों की बाड़ लगाई, ताकी जानवर आदि उसे खा न सके,  मैं रोजाना उसमें पानी डालने जाता था। कितना सुखद लगता,  जब उसमें कोई कोमल पत्ता निकलता,  फिर शाखा-प्रशाखा, टहनी याँ जैसे-जैसे वो बड़ा होता, मेरे अन्दर भी कुछ बढ़ता सा प्रतीत होता था। नन्हा सा, सुकोमल पौधा देखते ही देखते एक दिन जब वो वृक्ष हो गया, जब उसमें पहली बार दो चार फूल खीलें तो मेरे मन कैसे रचयिता होने का भाव जगा था। सहमल कैसे चारों तरफ़ लम्बे-लम्बे घाघरे की तरह टहनियाँ घुमाता हुआ बढ़ता है, जैसे अभी नृत्य करने वाला है। बसंत में पत्ते विहीन फूलों से लदी टहनियाँ आपकी नजरों को ना चाहते हुए भी बरबस अपनी और खींच लेगी। आज तालाब विहीन वो उदास दिखता है, न फूलों में वो चमक है, न पत्तों में इठलाना पन,  उदास, मायूस ऐसे खड़का दिखता है, जैसे एक रोते बच्चे का काजल फैल कर सारे मुहँ को रंग गया हो, अब वो दीवार से मुहँ सटाए उदास रूठा खड़ा है, और माँ उसे हँसाने के लिए आईने का सहारा ले रही हो। मुझे भी ऐसा लगता है, काश मैं तालाब में उसका गंदा कुरूप चेहरा उसे दिखा पाता,  तो ज़रूर वो नन्हे बच्चे की तरह किलकारी मार कर हँस पड़ता, मैं लाचार बेबस उसे देखता हूँ, कहाँ से लाऊं उसके लिए ''रामतला''। शायद वो मेरी बेबसी समझ गया, और अब उसने इंतजार करना भी छोड़ दिया।             
            जेष्ठ की भीषण तपिश से पहाड़-मैदान जब झुलस रहे होते थे, तब भी राम तला हजारों पशु, पक्षियों और मनुष्यों के शारीर की जलन को कम करता था। श्याम होते तक आग उगलती हवा भी तालाब के सम्पर्क मैं आते ही दुर तक कैसी शीतलता भर देती थी। जेष्ठ में दादा बूढ़े की दूज आते तक, राम तला के चेहरे पर बुर्जगी की बड़ी-बड़ी तरेड़ें फैल जाती थी। तब पूरा गाँव उमड़ कर कैसे उसमें भरी कीचड़ के ढेलों को निकाल-निकाल कर उसके किनारे मज़बूत करने के लिए पाल बाँधते थे। सूखे ढेलों के नीचे जब कोई मेढक या कछुआ दिखाई दे जाता तो नई नवेली दुल्हन या बच्चा कैसे अचानक किलकारी मारता,  तब शान्त और थकान भरे वातावरण में कैसे हँसी की फुहार फैल  जाती थी। दिन भर गुड़ और मालपुवो की दावत चलती । साल भर की धूल धमास,  कीचड़ से मुक्ति पा राम तला आने वाली बरसात के लिए फिर जवान हो जाता था। आज भी लकीर पिटी जाती है परम्परा की न उसकी ज़रूरत है न उसमें कोई उत्सव है।
            सावन की बौछारें पूरी प्रकृति के अन्दर शीतलता के साथ नए जीवन का संचार भी भर देती हैं। महरून कोमल तीज घास की पुल्लिंगों पर ही नहीं रास्ते पर भी आपको पेर सम्हाल कर रखने को मजबूर कर देगी। तीज की कोमल त्वचा को जरा सा छुआ नहीं की कैसे नई नवेली दुल्हन की तरह सिकुड़ कर  बैठ जाएगी। कुंवारी लकडियां ही नहीं बढ़ी बुर्ज ग औरतें भी अल्हड़-नटखट हो रात भर झूला झूलती रहती थी। शायद रात उनके बुढ़ापे को अन्धेरे में देख नहीं पाती होगी, उन्होने भी इसका फायदा उठा कर अपने बचपन को बाहर निकाल लिया होगा। झूला-झूलते हुए उनके कंठ से निकलते मधुर गीत सर्व-सब‍ में  उल्लास भर देते थे। गीतों की मधुर आवाज़ पक्षियों में भोर होने का भ्रम पैदा कर देता थी, भ्रमित हो वो भी उनके कंठों से कंठ मिला चहकने लगते थे। तालाब शान्त हो, गीतों की मधुर लोरी में, सोता कैसे देव तुल्य प्रतीत होता था।
            दशहरे-दीपावली के दिनों में उसके आस पास जलते दीपक ऐसे प्रतीत होते मानो उसने सोने का ताज पहन लिया हो। घर-घर बनी मिट्टी गोबर की साँझी,  दशहरे वाले दिन खड़िया, गेरू से पुतते मिट्टी के गोल-गोल सितारे, तालाब के सीने पर जब तैराते हुए फ़ैलते तब  अनायास उसके चेहरे पर फैली हँसी देख कर समझ जायेंगे, कि वो गुदगुदी के कारण नन्हे बच्चे की तरह किलकारी मार कर हँस रहा हैं। रात को गीत गाती कुंवारी लड़कीयों के सर पर रखे मटके के छेद से निकलता दीपक का प्रकाश कैसा भला प्रतीत होता था। दुर से देखने पर ऐसा लगता कोई आसमान से हजारों तारों को तोड़ कर लिए चला आ रहा हैं। किनारों पर मेंढक और झींगुरों की ताने मानो बेड बाजा कर उनका स्वागत का भी काम कर रहे थे। पास खड़े गाँव के जवान लड़के किनारे पर पत्थरों और कंकरों का ढेर लिए बैठे रहते । लड़के उन मटकों को ले जाकर तालाब मैं बहुत गहरे तक छोड़ कर आते थे। क्‍योंकि उन्‍हें फोडना है, फिर किनारे पर ही फोड़ना में क्‍या बहादुरी सो उन्‍हें गहरे से गहरे पानी में जाने दिया जाता था। पानी पर तैरते मटकों से निकलता प्रकाश, टिमटिमाते तारों के अक्ष की तरह प्रतीत होता था। उठती हुई लहरे उसको करोड़ो टुकडों मैं तोड़ कर बिखेर देती थी। लगता जैसे अंनत बॅजरे किसी विशाल नदी पर तैर रहे हो। एक विशालता, एक गोरव, गरीमा लिए तालब कितान गर्व से फूला नहीं समाता था।  मटके जब तालाब के बीचो-बीच पहुँच जाते तब लड़के अपनी बहादुरी दिखाते हुए उन्हे पत्थर मार कर तोड़ने लग जाते थे। लकडियां बेबस लाचार सी केवल दर्शक बनी देखती रहती थी। तर्क ये की मटका दूसरे किनारे पहुँच गया तो गाँव कि लड़की किसी के साथ भाग जाएगी, कई-कई लकडियां मटका फूटता देख रोने लग जाती थी। अब ये कोन जाने मटके का दुख या न भाग पाने का गम। शायद इस बे-बुझें प्रश्‍न का उत्तर न तब तालाब के पास तब था और न शायद आज है।
            कार्तिक की ठिठुरती रातों में जब गाँव की कुंवारी लकडियां भोर चार बजे उठ कर राम तला में सवा महीने स्नान करती,  तब उनके गीतों में ठिठुरती ठंड से काँपते होठों का कम्पन साफ़ सुनाई देता था। तालाब भी मानो उस ठन्ड़े पन मैं सुबकीयाँ ले रहा हो। बैल गाडियों के ऊपर उलटी चारपाइयों सजा कर,  उन्हे हिंडोलों की तरह दुल्हन बना रंग बिरंगे कपड़े पहन पूरे गाँव की बहूबेटियाँ जमना स्नान करने जाती थी। पूर्णिमा का चमकता चाँद,  उस दिन तालाब के सुने पन का साथी बन उसे मना रहा होता,  कि क्यों आज गाँव की लकडियां उसे छोड़ दूर जमना स्नान करने जा रही हैं,  क्या इसलिए की मैं स्थिर हूँ, और वो चलायमान? परन्तु जैसे ही सूर्य की किरणें उसपर फैली, पक्षियों की चह-चहाट के साथ वो भी चहक उठा था।
         होली का हुड़दंग हो, या बिखरते रंग गुलाल,  गाँव की प्रत्येक खुशी-गम सब में राम तला शामिल रहता था। गाँव की बारात घुड़चढी करके जाते हुए इसी तालाब के किनारे, डून्डें नीम की छाव में इकट्ठी होती थी। सब कैसे शारीर की जलन,  माथे का पसीना पोंछ गहरी साँस लेते थे।  माँ यही भरी पंचायत के सामने दूल्हे को दूध पिलाते हुऐ , कैसे शान और लाज से दोनों माँ और बेटे का मुहँ लाल हो जाता था। तब भी यही रामतला दूल्हे को विवाहा कर के लाने का संकल्प याद दिलाता था। नई नवेली दुल्हन इसी तालाब के किनारे,  नीम की डँड़ियों से मार कर पति-पत्नी प्यार से सौटका-सौटकी खेलते,  तब कैसे घूँघट की ओट से झाँकती हँसी,  नए प्यार को अंकुरित कर रही होती थी। लड़का होने के सवा महीने बाद कुआँ पूजन का साक्षी भी यही तालाब था। इस तालाब और बरगद की पीड़ा अब मेरी समझ में आई, डून्डे नीम की जड़ों के पास से अतिशय मिटटी खोदने के कारण एक दिन भयंकर तूफ़ान में वो धराशायी हो गया,  और फिर रामतला के खत्म होने के साथ-साथ छोटे-मोटे पेड़ पौधे भी दम तोड़ गए थे। जैसे वो उसके वियोग में स्‍थांरा कर प्राण त्याग रहें हों। बरगद, पीपल, सहमल गिनती के ही साहसी बुर्जुग बचे हैं।
            तालाब--’’छ: सो साल पहले जब ये गाँव बसा, तब मेरे सोन्द्रय  और स्वच्‍छ: निर्मल जल ने ही उन्हे यहाँ रुकने को मजबूर कर दिया था। दुर जहाँ तक आँखें देख पाती वहाँ तक  जल ही जल, बादल भी शान्त-एकान्त जल में अपनी छवि देखने लिए रुक निहारने लग जाता थे। हवा बार-बार धक्के मार कर उन्हे याद दिलाती, महाराज चलो आसन से डोलो बहुत लम्बा सफ़र तै करना है।  किनारे-किनारे खड़े पेड़-पौधे अपनी परछाई को देखते हुए कितने निरापद प्रतीत होते थे।’’
            बरगद--’’मैने तो जब से होश सम्हाला था, चारों तरफ़ तुम्हारा ही विस्तार फैला पाया था।’’
            तालाब--’’तुम जब इतने छोटे थे, कैसे मेरी लहरों को आता देख थर-थर कांपने लग जाते थे। ये तो उस ऊँचे मिटटी के टीले की मेहरबानी समझो, जिसे मैं तोड़ नहीं पाया वर्ना तो .... ...। ( ये कहते-कहते तालाब मानो उदास हो गया)   
            बरगद--’’हाँ दादा ये कैसा खेल हैं तुम्हीं से जीवन, तुम्ही से विलय। याद है एक रात जब बहुत तेज़ तूफ़ान आया था, कैसे जड़ तक प्राण काँप गए थे। लहरे भी किनारों से टकरा कर कैसा भयंकर शोर मचा रही थी, मानो दर्द से छटपटा कर करहा रही हो। उस भयंकर तूफ़ान ने मेरी भी एक बहुत बड़ी शाका को तोड़ दिया था, ढुन्ड़ा नीम तो उस दिन गिर कर आपकी गोद मैं धराशायी हो गया, गिरे हुए के पत्तों पर कैसी निर्भ्रम शांति छाई थी मानों गिरा नहीं  सालों खड़े-खड़े थक कर सो गया है।  उसके गौरव और सम्मान में प्रत्येक गाँव वालों ने उसे आखरी बिदाई से उसे घेर लिया था। उनके चेहरों पर उदासी फैली थी, किसी अपने के खोन का पीड़ा थी। इतने बड़े शोक के सामने अपने एक अंग को खोन की पीड़ा का तो मुझे भान ही नहीं रहा था। महीनों तक मेरी टहनी को नाव बना कर बच्चे किलकारियाँ
मारते हुए, तुम्हारे सीने पर कैसे किलोंलिया करते इस पार से उस पार आते-जाते थे। मैं उनके इस करतबों को देख कर मन ही मन हँसता था, मुझ जीवित के पास आने से तो कैसे डर के मारे मुँह पीला पड़ जाता था, और मुर्दा तने पर सवारी, हाय ये कैसी विडम्बना.....।'' (कहते-कहते बरगद ने एक गहरी साँस ली हो)
            तालाब--’’हाँ वो कितने स्वणिम और सुहाने दिन थे, अब ना वो दिन रहे न रहे वो बच्चे और न रहे वो खेल।’’
            बरगद और दफ़न तालाब अपनी यादों के ऊपर गिरी धूल मिटटी को झाड़ कर उन मीठी यादों में डूब जाना चाहते थे। हमने प्रकृति का कितना संग साथ खो दिया है। आज बचे पेड़ पौधों को देखो जो सीमेंट-कंकरीट में जीवित दफ़न खड़े, कैसे लाचार, बेबस, असहाय और उदास नज़र आते है। शायद ये दर्द, ये आहें आने वाले तूफ़ान की चेतावनी तो नहीं, न बुर्जगों की कोई सुनता है और न प्रकृति के दर्द को कोई महसूस करने की कोशिश करता है। दोनो अनदेखे और त्याज्य अनादर की वस्तु बन कर रह गए है।
            फिर उसके बाद मैं सालों उस बरगद के नीचे बैठ कर ध्यान करता रहा, उसको छूता, उसे बाँहों में भ्राता, उसके कानों में हलके से फुसफुसा कर कुछ कहा अनकहा सा कहने की कोशिश करता, लेकिन वो ध्वनि, वो शब्द फिर कहाँ खो गए। दूर खड़े हो कर देखता, तो लगता मुझे है इशारा कर अपने पास बुला रहा है। सर्दी की ठिठुरन, गर्मियों की तपिशकाले कजरा रे बादलों की गड़गड़ाहट, और न रिमझिम बरसती बरखा उसे हँसा पाई। वो निर्जीव सा पथराई आँखों से ख़ाली शून्य में ताकता रहता । अपनी विशालता को अपने में समेटे, उसकी सूनी टहनी या, उदास पत्ते, हवा की छुअन उन्हे धीरे हिलती खड़-खड़ाता जरूर परन्तु कुछ कहना चाह कर भी नहीं कहती थी। शायद ना वहाँ अब शब्दों की पहुँच थी,  न ही ध्वनि की....एक नीरव निशब्दता छाई रहती थी उसके चारों ओर।
            मैं जब भी उसे देखता,  तो सोचता,  उस दिन क्यों बोला। या ये सब मेरे मन का भ्रम था। शायद ये कभी न जान सकूँगा। या मैं खुद उसे जानना नहीं चाहता और एक सुखद भ्रम में जीना चाहता हूँ।


    मनसा आनंद ‘मानस’
 wz-29 गांव दसघरा, नई दिल्‍ली-110012